तुम तो ठहरे परदेसी (1998)

तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे
सुबह पहली गाड़ी से, घर को लौट जाओगे
सुबह पहली गाड़ी से...

जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी
(खिंचे खिंचे हुए रहते हो, ध्यान किसका है
ज़रा बताओ तो ये इम्तेहान किसका है
हमें भुला दो मगर ये तो याद ही होगा
नई सड़क पे पुराना मकान किसका है)
जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी
आँसुओं की बारिश में तुम भी भीग जाओगे
तुम तो ठहरे परदेसी...

ग़म की धूप में दिल की हसरतें न जल जाएं
(तुझको देखेंगे सितारे तो ज़िया मांगेंगे
और प्यासे तेरी जुल्फों से घटा मांगेंगे
अपने कांधे से दुपट्टा न सरकने देना
वरना बूढ़े भी जवानी की दुआ मांगेंगे (ईमान से))
ग़म की धूप में दिल की हसरतें न जल जाएं
गेसुओं के साए में कब हमें सुलाओगे
तुम तो ठहरे परदेसी...

मुझको क़त्ल कर डालो शौक़ से मगर सोचो
(इस शहर-ए-नामुराद की इज़्ज़त करेगा कौन
अरे हम भी चले गए तो मुहब्बत करेगा कौन
इस घर की देखभाल को वीरानियां तो हों
जाले हटा दिये तो हिफ़ाज़त करेगा कौन)
मुझको क़त्ल कर डालो शौक़ से मगर सोचो
मेरे बाद तुम किस पर ये बिजलियां गिराओगे
तुम तो ठहरे परदेसी...

यूं तो ज़िंदगी अपनी मैकदे में गुज़री है
(अश्क़ों में हुस्न-ओ-रंग समोता रहा हूँ मैं
आंचल किसी का थाम के रोता रहा हूँ मैं
निखरा है जा के अब कहीं चेहरा शऊर का
बरसों इसे शराब से धोता रहा हूँ मैं)
(बहकी हुई बहार ने पीना सिखा दिया
पीता हूँ इस गरज़ से के जीना है चार दिन
मरने के इंतज़ार ने पीना सीखा दिया)
यूं तो ज़िंदगी अपनी मैकदे में गुज़री है
इन नशीली आँखों से कब हमें पिलाओगे
तुम तो ठहरे परदेसी...

क्या करोगे तुम आखिर कब्र पर मेरी आकर
जब तुम से इत्तेफ़ाकन मेरी नज़र मिली थी
अब याद आ रहा है, शायद वो जनवरी थी
तुम यूं मिलीं दुबारा, फिर माह-ए-फ़रवरी में
जैसे कि हमसफ़र हो, तुम राह-ए-ज़िंदगी में
कितना हसीं ज़माना, आया था मार्च लेकर
राह-ए-वफ़ा पे थीं तुम, वादों की टॉर्च लेकर
बाँधा जो अहद-ए-उल्फ़त अप्रैल चल रहा था
दुनिया बदल रही थी मौसम बदल रहा था
लेकिन मई जब आई, जलने लगा ज़माना
हर शख्स की ज़ुबां पर, था बस यही फ़साना
दुनिया के डर से तुमने, बदली थीं जब निगाहें
था जून का महीना, लब पे थीं गर्म आहें
जुलाई में जो तुमने, की बातचीत कुछ कम
थे आसमां पे बादल, और मेरी आँखें पुरनम
माह\-ए\-अगस्त में जब, बरसात हो रही थी
बस आँसुओं की बारिश, दिन रात हो रही थी
कुछ याद आ रहा है, वो माह था सितम्बर
भेजा था तुमने मुझको, तर्क़-ए-वफ़ा का लेटर
तुम गैर हो रही थीं, अक्टूबर आ गया था
दुनिया बदल चुकी थी, मौसम बदल चुका था
जब आ गया नवम्बर, ऐसी भी रात आई
मुझसे तुम्हें छुड़ाने, सजकर बारात आई
बेक़ैफ़ था दिसम्बर, जज़्बात मर चुके थे
मौसम था सर्द उसमें, अरमां बिखर चुके थे
लेकिन ये क्या बताऊं, अब हाल दूसरा है
अरे वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है
क्या करोगे तुम आखिर कब्र पर मेरी आकर
थोड़ी देर रो लोगे और भूल जाओगे
तुम तो ठहरे परदेसी...

क्या यही प्यार है : रॉकी (1981)

क्या यही प्यार है
हाँ, यही प्यार है
दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं, वक्त गुज़रता नहीं
क्या यही प्यार है
हाँ, यही प्यार है

पहले मैं समझा, कुछ और वजह इन बातों की
लेकिन अब जाना, कहाँ नींद गई मेरी रातों की
जागती रहती हूँ मैं भी, चाँद निकलता नहीं
दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं
वक्त गुज़रता नहीं
क्या यही प्यार है...

कैसे भूलूँगी, तू याद हमेशा आएगा
तेरे जाने से, जीना मुश्किल हो जाएगा
अब कुछ भी हो दिल पे कोई, ज़ोर तो चलता नहीं
दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं
वक्त गुज़रता नहीं
क्या यही प्यार है...

जैसे फूलों के, मौसम में ये दिल खिलते हैं
प्रेमी, ऐसे ही क्या पतझड़ में भी मिलते हैं
रुत बदले, दुनिया बदले, प्यार बदलता नहीं
दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं
वक्त गुज़रता नहीं
क्या यही प्यार है...

ये जिस्म है तो क्या : जिस्म 2

ये जिस्म है तो क्या
ये रूह का लिबास है
ये दर्द है तो क्या
ये इश्क की तलाश है
फ़ना किया मुझे
ये चाहने की आस ने
तरह तरह
शिक़स्त ही हुआ

रज़ा है क्या तेरी
दिल-ओ-जहाँ तबाह किया
सज़ा भी क्या तेरी
वफ़ा को बेवफा किया
दुबारा ज़िन्दगी से यूँ मुझे जुदा किया
कहाँ-कहाँ फिरूँ मैं ढूंढता

वहाँ-जहाँ तू ही मेरा लिबास है
वहाँ-जहाँ तेरी ही बस तलाश है
वहाँ-जहाँ तुझी पे ख़तम आस है
वहीँ शुरू वहीँ पे दफ़न जान है
ये जिस्म है तो क्या...

इश्क भी किया रे मौला : जिस्म 2

इश्क भी किया रे मौला
दर्द भी दिया रे मौला
यूँ तो खुश रहा मगर
कुछ रह गया बाकी
फक्र भी किया है मौला
इल्म भी लिया रे मौला
ज़िन्दगी जिया मगर
कुछ रह गया बाकी

तू नहीं दिखा रे मौला
सब नहीं बिका रे मौला
और जहाँ रुका वहाँ पे
जाम है खाली

चाह की कमी में तू है
आँख की नमी में तू है
आंसूं में तू प्यास में तू
सांस में तू
बेवजह हंसी में तू है
जो दिखे उसी में तू है
अश्क में तू, रश्क में तू
जान में तू
इश्क भी किया...

ज़ीस्त की सच्चाईयों से
रूह की गहराईयों से
रात की तन्हाइयों से
तू गुज़र ज़रा...

चल चलें अपने घर : वो लम्हें

चल चलें अपने घर
ऐ मेरे हमसफ़र
बंद दरवाज़े कर
सबसे हो बेख़बर
प्यार दोनों करें
रात भर टूटकर
चल चलें...

ना जहाँ भीड़ हो, ना जहां भर के लोग
ना शहर में बसे, लाखों लोगों का शोर
चंद लम्हें तू इनसे मुझे दूर कर
चल चलें...

दूरियाँ दे मिटा, जो भी है दरमियाँ
आज कुछ ऐसे मिल, एक हो जाए जाँ
भर मुझे बाहों में, ले डूबा चाह में
प्यार कर तू बेपनाह
ख़तम बेचैन रातों के हो सिलसिले
यूँ लगा ले मुझे आज अपने गले
खोल हर बंदिशें, आज मुझमें उतर
चल चलें...

आँखों ही आँखों में करे बातें : बर्फी

आँखों ही आँखों में करे बातें
गुपचुप गुपचुप गुपचुप होए
फुस फुस फुस फुस
ख़्वाबों की नदी में खाए गोते

आला आला मतवाला बर्फी
पाँव पड़ा मोटा छाला बर्फी
रातों का है ये उजाला बर्फी
गुमसुम गुमसुम ही मचाये ये तो उत्पात
खुराफाती करे नॉन-स्टॉप
मौला इसी से बचाई ले
कभी न रुकता रे, कभी न थमता रे
रंग जो दिखा उसे खुशियों की ठोकर मारे
पलकों की हरमुनिया, नैनों की ग रे स रे

धड़कन की रिदम पे ये गाता जाए गाने प्यारे
भोला न समझो ये चालू खिलाडी है बड़ा
सूरज ये बुझा देगा, मारेगा फूँक ऐसी
चौक तलैय्या पीपल छैय्या
हर कूचे की ऐसी तैसी
आँखों ही आँखों में करे बातें
गुपचुप गुपचुप...

बर्फी जो अम्मा जी की कोख में था सोया
अम्मा ने मर्फी का रेडियो मंगाया
मर्फी मुन्ना, जैसा लल्ला
अम्मा का था सपना
मुन्ना जब हौले-हौले दुनिया में आया
बाबा ने सीलोन वाला स्टेशन लगाया
रेडियो ऑन हुआ, अम्मा ऑफ हुई
टूटा हर सपना
मुन्ना म्यूट ही आसूं बहाए
मुन्ना झुनझुना सुन भी न पाए
आला आला मतवाला बर्फी

फिर ले आया दिल मजबूर : बर्फी

फिर ले आया दिल मजबूर
क्या कीजे
रास न आया रहना दूर
क्या कीजे
दिल कह रहा उसे मुकम्मल कर भी आओ
वो जो अधूरी सी बात बाकी है
वो जो अधूरी सी याद बाकी है

करते हैं हम आज कुबूल
क्या कीजे
हो गयी थी जो हमसे भूल
क्या कीजे
दिल कह रहा उसे मयस्सर कर भी आओ
वो जो दबी सी आस बाकी है
वो जो दबी सी आंच बाकी है

किस्मत को है ये मंज़ूर
क्या कीजे
मिलते रहे हम बादस्तूर
क्या कीजे
दिल कह रहा है उसे मुसलसल कर भी आओ
वो जो रुकी सी राह बाकी है
वो जो रुकी सी चाह बाकी है
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